रांची: झारखंड की राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं जिनकी पहचान सिर्फ उनके पद से नहीं, बल्कि उन जिम्मेदारियों से बनती है जिन्हें वे पर्दे के पीछे रहकर निभाते हैं। सुदिव्य कुमार सोनू भी ऐसे ही नेताओं में शामिल रहे। करीब तीन दशक तक झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से जुड़े रहने के बाद उन्होंने गिरिडीह की राजनीति से राज्य सरकार तक अपनी अलग पहचान बनाई।
56 वर्षीय सुदिव्य कुमार सोनू के आकस्मिक निधन से झामुमो ने एक ऐसे नेता को खो दिया है, जिन्हें पार्टी संगठन, चुनावी रणनीति और सरकार के कठिन मामलों में भरोसेमंद चेहरा माना जाता था। उनका निधन 6 सितंबर 2026 को गिरिडीह में तबीयत बिगड़ने के बाद हुआ। रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें सीने में दर्द के बाद अस्पताल ले जाया गया था और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
1989 में शुरू हुआ सफर, तीन दशक बाद मंत्री की कुर्सी तक पहुंचे
सुदिव्य कुमार सोनू ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत 1989 में झामुमो के प्राथमिक सदस्य के रूप में की थी। 1992 में वह गिरिडीह नगर झामुमो के संस्थापक अध्यक्ष बने। इसके बाद उन्होंने संगठन और स्थानीय राजनीति में लगातार काम किया।
विधानसभा की चुनावी राजनीति में उनका सफर आसान नहीं रहा। उन्होंने 2009 और 2014 में गिरिडीह विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। 2014 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन राजनीतिक संघर्ष जारी रखा। आखिरकार 2019 में पहली बार गिरिडीह सदर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। 2024 में उन्होंने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की और इसके बाद हेमंत सोरेन सरकार में कैबिनेट मंत्री बने।
गिरिडीह सिर्फ चुनाव क्षेत्र नहीं, राजनीतिक पहचान का आधार बना
सुदिव्य कुमार की राजनीति की सबसे मजबूत जमीन गिरिडीह रही। विधायक के रूप में उन्होंने स्थानीय मुद्दों को लगातार उठाया और राज्य सरकार के कार्यक्रमों में भी सक्रिय भूमिका निभाई। मुख्यमंत्री कार्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उन्हें गिरिडीह विधायक के तौर पर कई सरकारी कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ सक्रिय रूप से भाग लेते हुए देखा जा सकता है।
गिरिडीह में उनकी सक्रियता का एक उदाहरण सोलर सिटी योजना से भी जुड़ा रहा। 2022 में मुख्यमंत्री के साथ हुई बैठक में उन्होंने गिरिडीह को सौर ऊर्जा के क्षेत्र में आगे ले जाने और योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने की प्रतिबद्धता जताई थी।
हेमंत सोरेन के भरोसेमंद साथियों में क्यों गिने जाते थे?
सुदिव्य कुमार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बीच राजनीतिक भरोसे का रिश्ता था। पार्टी के भीतर उनकी भूमिका केवल विधायक या मंत्री तक सीमित नहीं रही। कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में संगठन और सरकार के बीच समन्वय बनाने वाले नेताओं में उनका नाम लिया जाता था।
हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद झामुमो के सामने आए राजनीतिक संकट के दौरान भी पार्टी को संभालने में सुदिव्य कुमार की भूमिका महत्वपूर्ण बताई गई। मुख्यमंत्री ने उनके निधन पर उन्हें राजनीतिक सहयोगी से बढ़कर बड़े भाई और भरोसेमंद सहारे के रूप में याद किया।
कल्पना सोरेन के पहले चुनाव में भी निभाई अहम भूमिका
2024 में हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद गांडेय विधानसभा उपचुनाव झामुमो के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। यह चुनाव कल्पना सोरेन के राजनीतिक सफर का महत्वपूर्ण पड़ाव बना।
इस दौरान सुदिव्य कुमार को चुनावी अभियान की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। संगठन के स्तर पर रणनीति बनाने और चुनाव अभियान को दिशा देने में उनकी भूमिका रही। कल्पना सोरेन की जीत ने झामुमो को उस दौर में महत्वपूर्ण राजनीतिक ऊर्जा दी।
मंत्री बने तो एक साथ कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी
2024 में लगातार दूसरी बार विधायक चुने जाने के बाद सुदिव्य कुमार सोनू को हेमंत सोरेन सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया।
उनके पास उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, नगर विकास एवं आवास, पर्यटन, कला-संस्कृति, खेलकूद और युवा कार्य जैसे महत्वपूर्ण विभाग रहे। मुख्यमंत्री कार्यालय के हालिया रिकॉर्ड में भी उन्हें इन विभागों से जुड़े सरकारी कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए दर्ज किया गया है।
एक साथ इतने महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिलना सरकार में उनके राजनीतिक और प्रशासनिक भरोसे को भी दर्शाता था।
JPSC-JSSC विवाद में छात्रों से सीधे संवाद की जिम्मेदारी
शिक्षा विभाग संभालने के दौरान सुदिव्य कुमार के सामने सबसे चुनौतीपूर्ण मुद्दों में से एक प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर छात्रों की नाराजगी थी।
JPSC-JSSC से जुड़े विवादों और छात्र आंदोलनों के दौरान उन्होंने प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों से बातचीत की। सरकार और छात्रों के बीच संवाद कायम करने की कोशिश में वह प्रमुख चेहरों में रहे। यही भूमिका उन्हें पारंपरिक राजनीतिक नेता से अलग एक संवाद करने वाले संकट-प्रबंधक के रूप में सामने लाती थी।
राजनीतिक बातचीत में भी निभाते थे अहम भूमिका
सुदिव्य कुमार की जिम्मेदारियां सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं थीं। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सहयोगी दलों के साथ राजनीतिक बातचीत और सीट बंटवारे जैसे मामलों में भी उनकी भूमिका सामने आई।
उनकी खासियत यह थी कि पार्टी नेतृत्व उन्हें ऐसे मामलों में आगे करता था, जहां राजनीतिक संवाद, संगठनात्मक समझ और परिस्थितियों को संभालने की जरूरत होती थी।
आखिरी संदेश में भी दिखी विचारों की झलक
निधन से कुछ दिन पहले जन्माष्टमी के अवसर पर सुदिव्य कुमार सोनू ने सोशल मीडिया पर एक संदेश साझा किया था। उसमें सत्य, कर्तव्य और समाज के कल्याण की भावना पर जोर दिया गया था। उनके निधन के बाद यह पोस्ट सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गया।
एक नेता का जाना, संगठन में एक खाली जगह
सुदिव्य कुमार सोनू का राजनीतिक सफर किसी एक चुनाव या मंत्री पद की कहानी नहीं था। यह 1989 में शुरू हुए संगठनात्मक सफर से लेकर 2019 की पहली विधानसभा जीत और 2024 में लगातार दूसरी जीत के बाद मंत्री बनने तक के लंबे संघर्ष की कहानी थी।
गिरिडीह के स्थानीय नेता से लेकर राज्य सरकार के कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभालने तक उन्होंने झामुमो की राजनीति में अपनी जगह बनाई। मुख्यमंत्री के करीबी सहयोगी, संगठन के रणनीतिकार, चुनावी प्रबंधक और छात्रों के साथ संवाद करने वाले मंत्री के तौर पर उनकी कई भूमिकाएं रहीं।
उनके आकस्मिक निधन के साथ झामुमो ने सिर्फ एक मंत्री और विधायक नहीं, बल्कि ऐसा नेता खोया है जिसे कठिन परिस्थितियों में आगे खड़े होने की क्षमता के लिए जाना जाता था। यही वजह है कि सुदिव्य कुमार सोनू की राजनीतिक विरासत को आने वाले समय में सिर्फ उनके पदों से नहीं, बल्कि तीन दशक लंबे संगठनात्मक सफर और संकट की घड़ी में निभाई गई भूमिकाओं से याद किया जाएगा।


























