बिहार में वर्ष 2016 से लागू शराबबंदी कानून को लगभग दस साल पूरे होने वाले हैं। इसी बीच एक बार फिर इस कानून की समीक्षा को लेकर प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। सदन में एनडीए के सहयोगी दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायक माधव आनंद द्वारा शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग उठाए जाने के बाद राजनीतिक बयानबाज़ी तेज हो गई है।
माधव आनंद ने सदन में कहा कि शराबबंदी कानून की समीक्षा होनी चाहिए। उनके इस बयान के बाद जेडीयू ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार द्वारा बनाए गए हर कानून की समय-समय पर समीक्षा होती है और शराबबंदी कानून की भी समीक्षा होती रही है। जेडीयू के प्रवक्ता अभिषेक झा ने बिना नाम लिए कहा कि समीक्षा की आड़ में अगर कोई ढिलाई या कानून को समाप्त करने की बात करना चाहता है तो यह संभव नहीं है। उन्होंने दोहराया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी को मजबूती से लागू किया है और आगे भी इसे लागू रखा जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कुछ लोग अन्य राज्यों की स्थिति से तुलना कर भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
वहीं एआईएमआईएम के विधायक अख्तरुल ईमान ने शराबबंदी कानून को पूरी तरह विफल बताया। उनका आरोप है कि बिहार में शराब की अवैध होम डिलीवरी हो रही है और शराब माफिया को संरक्षण प्राप्त है। उन्होंने यह भी कहा कि शराबबंदी के कारण नई पीढ़ी ‘सूखे नशे’ की ओर बढ़ रही है, जो चिंताजनक स्थिति है।
इस मुद्दे पर आरजेडी ने भी सरकार को घेरा है। पार्टी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि शराबबंदी की पोल अब सत्ता पक्ष के विधायक ही खोल रहे हैं। उन्होंने जहरीली शराब से हुई मौतों का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री से जवाब देने की मांग की। कांग्रेस ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि पुलिस अवैध शराब की बिक्री रोकने में असफल रही है। कांग्रेस विधायक अभिषेक रंजन ने कहा कि यदि पुलिसकर्मियों की जांच हो तो कई तथ्य सामने आ सकते हैं।
दूसरी ओर, बिहार सरकार के वरिष्ठ मंत्री विजय चौधरी ने कहा कि शराबबंदी कानून सदन में सभी दलों की सहमति से लागू किया गया था और यह आगे भी लागू रहेगा। फिलहाल, शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग ने बिहार की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है, जहां सत्ता और विपक्ष आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं।
35 रुपये में एक्स-रे, 17 रुपये में किडनी जांच: खान सर ने अब शुरू की सबसे सस्ती स्वास्थ्य सेवा

























