पटना: नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने भाजपा-जदयू गठबंधन को खुली चुनौती देते हुए कहा है कि अगर अकेले-अकेले चुनाव लड़ना है तो “फरियाइए, हैसियत का पता चल जाएगा।” उनके इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या राजद वास्तव में अकेले दम पर बहुमत हासिल कर सकता है, या यह सिर्फ राजनीतिक दबाव की रणनीति है?
इतिहास पर नजर डालें तो तस्वीर आसान नहीं दिखती। पिछड़ों के बड़े नेता माने जाने वाले लालू प्रसाद यादव भी राजद गठन के बाद कभी अपने दम पर बहुमत नहीं ला सके। वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में, जब बिहार अविभाजित था और कुल 324 सीटें थीं, राजद ने 293 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन उसे केवल 124 सीटें मिलीं—बहुमत से 39 कम। बाद में कांग्रेस और निर्दलीयों के समर्थन से राबड़ी देवी की सरकार बनी।
झारखंड गठन के बाद विधानसभा 243 सीटों की रह गई, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता जारी रही। फरवरी 2005 में राजद 75 सीटों पर सिमट गया और अक्टूबर 2005 में सत्ता से बाहर हो गया। उसी दौर में बिहार की राजनीति बहुध्रुवीय हो चुकी थी—राजद, जदयू और भाजपा अलग-अलग ध्रुव के रूप में उभरे। खंडित जनादेश ने गठबंधन राजनीति को अनिवार्य बना दिया।
ऐसे में तेजस्वी यादव की ‘अकेले चुनाव’ की चुनौती को राजनीतिक आत्मविश्वास और रणनीतिक दबाव—दोनों नजरियों से देखा जा रहा है। क्या यह महागठबंधन के भीतर अपनी ताकत दिखाने की कोशिश है, या वाकई राजद अकेले मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है? बिहार की बदलती सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के बीच यह सवाल फिलहाल खुला है।
























